रेशु आण्टी

मैं अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिये गांव से अपनी आण्टी रेशू के यहाँ शहर में आ गया था। अब तक मुझे सेक्स के बारे में जरा भी ज्ञान नहीं था, यहाँ तक कि मेरा कभी वीर्य पात तक नहीं हुआ था। पर हाँ, मेरे दोस्त लण्ड चूत की बात करते थे। कुछ चोदने या चुदाई की बातें भी किया करते थे। पर मैं अब तक उनका मतलब नहीं जानता था।

मेरे शहर पहुँचते ही जैसे रेशू आण्टी खुश हो गई। उसकी नजरें मुझ पर पड़ गई थी और वो मेरे गठीले शरीर को बहुत ही चाव से निहारती थी। मैं एकदम से उन्हें समझ नहीं पाया... उनकी वासना भरी निगाहें तो मुझे प्यार भरी नजरें लगती थी। मैं तो गांव के और लोगों की भांति पैंट के अन्दर धारीदार कच्छा ही पहनता था। नहाता भी खुले आंगन में था। मेरी नूनी जिसे हम लण्ड कहते हैं, वो अनजाने में कभी कभी बस यूं ही खड़ी हो जाया करती थी, कभी नहाते समय तो कभी सवेरे सो कर उठते समय भी।

रेशू तो सवेरे सवेरे मेरी खड़े हुये लण्ड को देखने ही आती थी और देर तक निहारती रहती थी। मेरी खड़ी हुई डण्डी को देख कर बस मुस्कराती रहती थी जैसे मन ही मन में वो उसके साथ कुछ करने की कोशिश करती हो। एक बार तो नहाते समय रेशू आण्टी से रहा नहीं गया, उन्होंने मेरी नूनी को जैसे हल्का सा हाथ मार कर कह ही दिया, तभी मुझे एक विचित्र सी अनुभूति भी हुई थी।

"इसे नीचे ही रखा करो, तुम्हें शरम नहीं आती?" रेशू की आवाज में मजाक का पुट अधिक था।

मैं भोला भाला सा लड़का, कुछ समझा ही नहीं, सोचा कि आण्टी मजाक ही कर रही है। मैंने अपना खड़ा हुआ लण्ड उनसे कभी छुपाया नहीं था। उन्होंने इसका मतलब भी कुछ और ही निकाल लिया था। जब उन्होंने मेरा कोई विरोध नहीं पाया तो उनका साहस खुलने लगा।

एक दिन जब मैं कॉलेज जाने की तैयारी में था, तब वो अचानक मेरे कमरे में आ गई। मैं पैंट पहन ही रहा था कि उन्होंने मुझ रोक दिया।

"पहन लेना कपड़े, ऐसी जल्दी क्या है?"

और वो मेरे समीप आ गई, मेरी खड़ी नूनी को थोड़ा सा हिला कर बोली- यह क्या ऐसे ही खड़ा रहता है...?

उनके इस अजीब से प्रश्न पर मैं चौंक सा गया। पर उनके लण्ड पर हाथ लगाने से मुझे एक सुहानी सी सिरहन हुई। वो मेरी हालत देख कर हंस पड़ी।

"आण्टी, ऐसे ना करो ऐसे, गुदगुदी लगती है !"

पर मुझे लगा कि वो ऐसा और करे।

"अच्छा बैठ जा ... और अब बता, सच में गुदगुदी लगती है तुझे?"

मुस्करा कर उन्होंने मेरी डण्डी को पकड़ कर और हिला दिया। मेरा लण्ड सख्त होने लगा था। मेरे शरीर में जैसे सनसनाहट सी होने लगी। मैंने अपने पांव समेट लिये और नूनी पर अपना हाथ रख कर उसे छुपा लिया।

"अरे आण्टी आप जब हाथ लगाती हैं तो नूनी में बहुत जोर से गुदगुदी लगती है... पर जब मैं हिलाता हूँ तो बिल्कुल नहीं लगती है।" मैंने कुछ शरमा कर कहा।

"सुन, अपना हाथ नूनी पर से हटा और मुझे आण्टी मत कहा कर, रेशू कहा कर !"

मैंने ज्योंही हाथ हटाया तो रेशू ने मेरी नूनी कठोरता से पकड़ ली। उनकी आँखों में गुलाबीपन आ गया। उनके शरीर में एक कंपकंपाहट सी होने लगी। उनके सीने की चोली कसने सी लगी, तब उन्होंने उसे हिला कर सेट किया।

छातियाँ तेज सांस के कारण ऊपर नीचे होने लगी थी। मैं तो जैसे ऊपर से नीचे तक कांप गया। एक नया अनुभव, एक नई तरंग... एक नया आनन्द...

"रेशू जी, मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है... ये मुझे क्या हो रहा है?"

मैंने उसका हाथ कलई पर से पकड़ लिया, पर अपना लण्ड नहीं छुड़ाया, मजा जो आ रहा था।

"गज्जू, अपना कच्छा तो थोड़ा उतार... तेरा लण्ड तो शानदार लगता है।"

ओह, तो लण्ड इसे कहते है। इससे तो लड़कियों को चोदा जाता है, मैं कुछ कहता उसके पहले ही रेशू ने धारीदार चड्डी का मेरा नाड़ा वो खींच चुकी थी। रेशू ने चड्डी नीचे कर दी और मेरी डण्डी पकड़ कर उसे ललचाई नजर से देखने लगी।

"आह, गज्जू, इतना बड़ा है तेरा लण्ड तो, तूने कभी किसी लड़की को चोदा है क्या?"

"जी, क्या चोदा? आप ठीक से बतायें रेशू जी।"

रेशू की चोदने वाली बात मेरी समझ से परे थी। कभी किसी को चोदा जो नहीं था ना। वो थोड़ा सा उठी और मेरी गोदी में बैठ गई और मेरे चेहरे को थाम कर मुझे प्यार करने लगी, चूमने लगी। मेरा खड़ा लण्ड उसके चूतड़ों के बीच दरार में धंसा जा रहा था।

"आप मुझे बहुत प्यार करती है रेशू जी?"

मुझे ये सब बहुत भाने लगा था। मेरा लण्ड कठोर हो कर बहुत जोर मार कर उसकी गाण्ड के छेद तक को ठोकर मार रहा था।

"हाँ हाँ ! बहुत सारा प्यार करती हूँ, चल बिस्तर पर चल, तुझे सिखाती हूँ कि प्यार कैसे करते हैं।"

मुझे तो रेशु के इस काम में बड़ा ही आनन्द आ रहा था। सारा शरीर एक अजीब सी गुदगुदी और रोमान्च से भरा जा रहा था। मेरा शरीर जैसे मीठी सी अग्नि में सुलग सा रहा था। तभी मेरा ध्यान रेशू के उन तड़पते हुये सीने के उभारों पर चला गया। मुझे याद आया कि दोस्त चूचियों के लिये भी दबाने को कहते थे। अनजाने में ही मेरे हाथ उस ओर बढ़ चले और रेशू के तने हुये कठोर वक्ष को मैंने दबा डाला। रेशू जैसे तड़प गई।

"इसे दबाते हैं ना रेशु जी?"

"हाय, जालिम, मेरी जान निकाल देगा क्या, और जरा मस्ती से दबा ... आह..."

उसने मुझे घसीटते हुये बिस्तर पर ला पटका। मेरा कच्छा मेरे पांव से फ़िसलत हुआ नीचे उतर गया। रेशू ने मुझे बिस्तर पर पटक दिया और मेरे नंगे शरीर पर सवार हो गई। अपना पेटीकोट ऊंचा करके मेरी कड़क डण्डी पर अपनी नंगी चूत को घिसने लगी। मैंने भी जोश में उन्हें लिपटा लिया और अपने आप ही उनके होंठों को अपने होंठो में भर लिया। रेशू जैसे अपने होश में नहीं थी। उसने मेरा लण्ड पकड़ कर ऊपर नीचे करके घिसने लगी। मेरा शरीर वासना की आग में जलने लगा, मेरा लण्ड बहुत ही कड़क हो चुका थी, लग रहा था कि कोई उसे जोर से रगड़ कर घिस डाले। मेरा तन वासना से भर गया ... मुझे जाने कैसा कैसा लगने लगा, जिन्दगी में पहली बार कोई युवती मुझसे इस प्रकार लिपट कर प्यार कर रही थी। जैसे मेरी जान निकलने को थी। एकाएक मेरा लण्ड उसकी गीली सी चूत में घुस सा गया। पर फिर बाहर निकल आया। इसी लण्ड को तोड़ने और मरोड़ने ने मेरी डन्डी ने जैसे आग उगल दी। मुझे लगा कि मेरा पेशाब या कुछ ऐसा ही मेरे लण्ड में से जोर से छूट गया। यह मेरा प्रथम वीर्यपात था ... प्रथम स्खलन...

मेरा सारा जोश तेजी से ठण्डा पड़ता जा रहा था। रेशू को भी पता चल गया था कि मेरा माल निकलता जा रहा है। वो थोड़ा सा खीजती हुई मेरे ऊपर से उतर गई। उसकी वासना की आग बुझ नहीं पाई थी।

"अरे बाप रे, रेशू आण्टी, मुझे तो देर हो गई।" कॉलेज में देर हो जाने से मैं घबरा गया था।

"रेशू जी, लौट कर आऊँगा तो प्यार करेंगे।"

"अरे नहीं, उनके सामने नहीं करना, अकेले में चुपके से, यानि कल सुबह को, उनके ऑफ़िस जाने के बाद।"

"हाँ ठीक है... ठीक है..."

कुछ सुना अनसुना सा करके मैंने झटपट कपड़े पहने और कॉलेज की ओर दौड़ लगा दी। मुझे नहीं पता था कि यह प्यार तो अकेले में करने का होता है और इस तरह का प्यार तो छुप छुप के ही हो सकता है। मैं तो मन ही मन सोच रहा था रेशू आण्टी कितनी अच्छी है, मुझे तो वो खूब प्यार करती हैं।

"अरे बाप रे, रेशू आण्टी, मुझे तो देर हो गई।" कॉलेज में देर हो जाने से मैं घबरा गया था।

"रेशू जी, लौट कर आऊँगा तो प्यार करेंगे।"

"अरे नहीं, उनके सामने नहीं करना, अकेले में चुपके से, यानि कल सुबह को, उनके ऑफ़िस जाने के बाद।"

"हाँ ठीक है... ठीक है..."

कुछ सुना अनसुना सा करके मैंने झटपट कपड़े पहने और कॉलेज की ओर दौड़ लगा दी। मुझे नहीं पता था कि यह प्यार तो अकेले में करने का होता है और इस तरह का प्यार तो छुप छुप के ही हो सकता है। मैं तो मन ही मन सोच रहा था रेशू आण्टी कितनी अच्छी है, मुझे तो वो खूब प्यार करती हैं।

दूसरे दिन सवेरे का मैं बेसब्री से इन्तज़ार करता रहा, शायद मेरे से अधिक रेशू को इन्तज़ार था। उसके तन बदन अनबुझी आग बाकी थी, मैंने सुबह उठते ही रसोई की तरफ़ दौड़ लगा दी। सवेरे रेशू आण्टी वहीं होती थी।

मैंने उन्हें जोर से प्यार कर लिया- आण्टी, मेरा लण्ड पकड़ो ना !

वो एकदम से घबरा गई- यह क्या कर रहे हो गज्जू? कोई देख लेगा !

"ओहो ... पकड़ो ना मेरा लण्ड आण्टी, कल तो बहुत प्यार किया था ना आपने !"

"क्या हुआ रेशू डार्लिंग... क्या पकड़वाना है... लाओ मैं मदद कर दूँ !" अंकल ने रसोई में आते हुये कहा।

रेशू घबरा सी गई।

"अरे नहीं नहीं, कुछ भी नहीं ... ये गज्जू है ना ... इसे नाश्ता चाहिये।"

"गज्जू, आण्टी को काम करने दो चलो, यहाँ टेबल पर आ जाओ।"

मैं मन मार कर मेज के पास आकर बैठ गया। नाश्ता वगैरह करके अंकल तो फ़्रेश होने चले गये।

नौ बजते बजते अंकल ऑफ़िस चले गये। अंकल के जाते ही रेशू आण्टी ने मुझे फ़टकार पिलाई।

अंकल के सामने ही गड़बड़ करने लगे थे।

"क्यों आण्टी जी, लण्ड पकड़ने को ही तो कहा था?"

रेशू के चेहरे पर हंसी बिखर गई, वो हंसते हुये बोली- अरे मेरे लल्लू जी, वो तुम्हें लण्ड नजर आता होगा, ये तो खासा पहलवान लौड़ा है लौड़ा !

रेशू आण्टी ने फिर से मेरा लण्ड थाम लिया... फिर पजामे में से बाहर निकालते हुये बोली- देखो तो ये लण्ड है या लौड़ा...?

फिर वो धीरे से लण्ड दबाने लगी। मुझे एक तेज गुदगुदी सी हुई। इस समय तो वो तो सिर्फ़ एक पेटीकोट और कसे हुये ब्लाऊज में थी, कोई ब्रा नहीं थी। वो मेरे से चिपकती हुई मेरे जिस्म को सहलाने और दबाने लगी। बीच बीच में रेशू आण्टी की सिसकारी भी सुनाई दे जाती थी। मैं भी जैसे तैयार था। बिल्कुल नंगा, मात्र बनियान पहने हुये। लण्ड तो चूत में घुसता है ना ... अब पजामा तो आण्टी ने उतार ही दिया था। बिल्कुल साफ़ सुथरा स्नान करके, गुप्तांगों की सफ़ाई करके... हाँ जी एकदम साफ़ सुथरा ... हो कर आया था।

रेशू के लिपटते ही मेरा लण्ड तन कर खड़ा हो गया था। मैं अब सब कुछ समझ चुका था। फिर तो मैं एक अभ्यस्त मर्द की भांति उसे आलिंगन में ले कर उसके अधरपान करने लगा।

रेशू ने प्यार से मेरे बालों पर हाथ फ़ेरा और मेरा चेहरा को झुका कर अपनी एक चूची मेरे मुख में दबा दी- चूस ले मेरे गज्जू, हाँ इस दूसरे को भी...

उसके कठोर चूचक को मैं चूसने लगा, उसके बोबे की गोलाइयों को मैं हाथ दबाता भी जा रहा था। उसने भी मेरी बनियान को खींच कर उतार दिया और नंगा कर दिया और मेरा लण्ड पकड़ कर अपनी चूत पर घिसने लगी। मैंने उसके गाण्ड की गोलाइयों को दबा दिया।

"कितना प्यारा लण्ड है, एकदम लोहे की तरह..."

"यह तो नूनी ही है रेशू जी, लण्ड तो गाली होती है।"

"यह लण्ड है और ये चूचियां है। मेरे नीचे चूत है समझे मेरे भोले पंछी !"

मैंने अपनी समझ के अनुसार यूं ही सिर हिला दिया, जैसे मैं कुछ जानता ही नहीं हूँ। पर जी नहीं, मैं इतना भी अनाड़ी नहीं था। मुझे सब कुछ समझ आता था। पर फिर भी कुछ आनन्द को मैं नहीं जानता था और ना ही उसके बारे में सुना था। फिर उसने मुझे सीधा खड़ा किया और नीचे बैठ गई। मेरे लण्ड को हिलाने लगी। मुझे गुदगुदी होने लगी।

तभी उसने मेरा लण्ड अपने मुखश्री में भर लिया।

"छिः छिः, ये क्या कर रही हो, ये तो गन्दा है।" मैंने उसे हटाने की कोशिश की।

"उहुं, खुशबूदार है ये तो, मस्त लौड़ा है !" रेशू ने अपनी मस्ती जारी रखी।

तभी उसने मेरे चूतड़ों को अपने हाथ में भर लिया और उसे अपनी दबा कर लण्ड को पूरा ही मुख में समा लिया। मुझे असहनीय आनन्द की पीड़ा होने लगी। मेरे मुख से अस्फ़ुट स्वर फ़ूट पड़े। मेरी कमर अपने आप ही चलने लगी और उसके मुखश्री को चोदने लगी। उसने तुरन्त मेरे लण्ड को मुख में से निकाल दिया, शायद उसे लगा होगा कि कहीं मेरा माल फिर से निकल जाये।

वो खड़ी हो गई और उसने झटपट अपना ब्लाउज उतार फ़ेंका और अपना पेटीकोट को खोल दिया। उसने मुझे प्यार किया और मुझे ले कर बिस्तर की ओर बढ़ गई।

"रेशू जी, अब क्या करना है...?"

"बिस्तर पर तो चलो... तुम्हें तो कुछ पता ही नहीं है... आओ लेट जाओ, बिलकुल सीधे, और अपने लण्ड को सीधा कड़क रखो।"

"तो... अब लेट कर कल की तरह प्यार करेंगे क्या?"

"हूं, चुदाई करेंगे..." वो मुस्काई।

"छीः आप तो गाली देने लगी।" उसने मेरे मुख पर अंगुली रख दी। मैं मन ही मन में अपने आप को बहुत समझदार समझने लगा था।

उसने मुझे लेटा दिया और अपनी चूत को मेरे मुख पर रख दिया।

"लो तुम भी थोड़ा सा चूस लो।"

"अरे हटो ना, ,ऐसे मत करो ..." मैं थोड़ा सा कसमसाया। पर उसके चूत में एक प्रकार की मधुर खुशबू थी, उसकी चूत पूरी गीली थी। उसने मेरा हाथ दोनों तरफ़ से दबा दिया और अपनी नंगी गीली चूत की फ़ांक को मेरे होंठों पर रख दिया। ना चाहते हुये भी मैंने उसे चूसना शुरू कर दिया। मेरे चूसने से वो आनन्द के मारे किलकारियाँ भरने लगी। मुझे लगा कि ऐसा करने से औरतों को आनन्द आता है। सो मैं और भी जोर जोर से चूसने लगा। उसकी चूत का गीलापन मेरे मुख से लिपट गया। फिर उसने अपनी चूत वहाँ से हटा ली और मेरी टांगों को दबा कर उस पर बैठ गई। मेरे लण्ड का बुरा हाल था। ऐसा लग रहा था कि कठोर हो कर फ़ट जायेगा। रेशू ने मेरे लण्ड का सुपारा खोल दिया। फिर वो विस्मित हो उठी।

मुस्कराहट उसके चेहरे पर तैर गई। मेरी तरफ़ मतलब भरी नजरों से देखते हुये वो मेरे लण्ड पर बैठ गई।

"मेरे अनाड़ी बालमा, आ, आज तेरी मैं पहली बार इज्जत उतार दूँ?"

मुझे हंसी आ गई उनकी बात पर, इज्जत तो औरतों की उतारी जाती है, और ये मेरी ... उंह !

तभी रेशू की चूत का दबाव मेरे लण्ड पर पड़ा। मुझे आश्चर्य हुआ कि रेशु ये क्या कर रही है। पर जल्दी समझ गया कि शायद चुदाई इसे ही कहते हैं। वो मुझे टेढ़ा-टेढ़ा देख कर मुस्करा रही थी। उसने अपने होंठों को एक तरफ़ से दांतों से दबाते हुये अपनी गीली चूत हल्के से दबा दी और मेरे कड़क लण्ड को अन्दर ले लिया। मुझे असीम आनन्द आ गया।तभी रेशू ने अपने आपको सेट करके अपना पोज बनाया और मेरे पर झुक गई।

"पहली चुदाई मुबारक हो !"

उसे भला कैसे पता कि यह मेरी पहली चुदाई है। उसके शरीर ने जोर लगाया और मेरा लण्ड चूत में पूरा उतर गया। मेरे लण्ड में एक तेज जलन हुई। मेरे कुंवारेपन की चमड़ी फ़ट चुकी थी। रेशू पहले तो मेरे बनते बिगड़ते चेहरे को देखते रही फिर उसकी कमर चल पड़ी। वो कब मेरे पर तरस खाने वाली थी। पहले तो मैं तकलीफ़ से तिलमिलाता रहा, फिर मुझ पर चुदाई की मीठी लहर ने काबू पा लिया। जब मुझे आराम सा आ गया तो मेरी कमर भी चुदाई में ताल से ताल मिलाने लगी।

रेशू खुश होकर तेजी से धमाधम मुझे चोदने लगी थी। जाने कब तक हम चुदाई के घोड़े पर सवार हो कर चुदाई करते रहे। हमारी सांसें तेज हो गई थी। पसीना चेहरे पर छलक आया था। उसकी तड़पती हुई कठोर चूचियों को मैं जोर जोर से घुमा घुमा कर मसल रहा था। उसकी सीत्कार कमरे में जोर से गूंज रही थी। तभी रेशू छटपटा पर झड़ गई। फिर उसने मेरा लण्ड पकड़ कर घिस कर मेरा भी वीर्य अपने मुखश्री में निकाल लिया।

इस बार के वीर्य स्खलन में बहुत रस था। मुझे लगा कि जैसे मेरे भीतर तक की आग शान्त हो गई है।

जीवन में जवान होते ही मैंने चुदाई का पहली बार रस लिया था। मुझे तो लग रहा था ही जीवन में चुदाई से बढ़कर और कोई दूसरा आनन्द नहीं है। मैं रेशू आण्टी का सदा आभारी रहूँगा कि उनके द्वारा मुझे यह अलौकिक आनन्द प्राप्त हुआ। रेशू और मैंने शहर में तीन साल की पढ़ाई के दौरान बहुत चुदाई की, सभी आसनों में चोदाचादी की। रेशू की चिकनी गाण्ड मैंने बहुत बार चोदी क्योंकि उसके बिना वो मानती भी तो नहीं थी। उसका कहना था कि शान्ति सभी छिद्रों से मिलनी चाहिये, चाहे वो मुखश्री का छेद हो या मस्त गाण्ड का। चूत तो सदाबहार मुख्यद्वार है ही चुदाई का.
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Categories: HardcoreMatureTaboo
Posted by coolguy2020
1 year ago    Views: 425
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